Thursday, April 21, 2011

बदकिस्मत....

चाहकर भी जता नहीं सकते,
पूछने पर भी बता नहीं सकते
ये कैसी मुहब्बत है,गोया की मुरव्वत है
के तुम्हे खोते तो रहते हैं ;लेकिन पा नहीं सकते....
ग़मों के ये तराने लिखे तो हैं लेकिन
इन्हें सिर्फ देख सकते हैं तुझे सुना नहीं सकते...
तुम गर पूछ बैठो की मुहब्बत है तुम्ही से तो
हम सच भी कह नहीं सकते,और झुठला नहीं सकते...
इस मायूसी और तन्हाई मैं तेरी यादें मुकम्मल है
अकेले से तो रहते हैं,मगर तनहा नहीं रहते...
तेरी खुशियों की खातिर मुहब्बत को क़त्ल कर बैठे
मगर इस कुर्बानी का सबाब कभी पा नहीं सकते....

Thursday, March 10, 2011

असमंजस....

असमंजस में हूँ मैं
प्रेम की अनजान राहों पे
कदम न रखे मैंने कभी
कुछ अनमना सा मन है
कुछ बेबस दिल हूँ में

ऑंखें झुका के चलता हूँ
गिरता और संभालता हूँ
प्रश्न न करे कोई इरादों को
इन घूरती नजरों के बीच
एक बदहवास सा दिल हूँ मैं
असमंजस में हूँ मैं

Monday, January 3, 2011

बेख़बर ...

दर्द है दर्द का बयाँ नहीं
राह है मंजिल-ओ-मकाँ नहीं
परस्तिश करते हैं तेरी ए नादाँ
मगर तेरा एक ज़र्रा भी मेहरबां नहीं

Thursday, December 16, 2010

क्या होगा !!!??

दायरा बढ़ने लगा
तिनके के ही गिरने से
ये तो सिर्फ एक झोंका था
क्या होगा तूफानों में !!??

एक बूँद ही दामन भिगा गई
सीलन सी आ गई रिश्तों में
अभी तो बादल गरजे हैं
क्या होगा बरसातों में !!??

पत्थर की तपिश से झुलस गए
छोड़ राह , चल दिए सायों में
अभी तो सफ़र का आगाज़ हुआ
क्या होगा गर्म चट्टानों में !!??

एक कांटे ने दामन पकड़ लिया
चुभन ने बेचैन कर दिया
अभी तो फूल भी साथ हैं
क्या होगा बीयाबानों में !!??

जो तुम दोगी साथ मेरा
रिश्तो की डोर न तोड़ेंगे
तुम ज़मीं पे साथ नहीं देती
क्या होगा उन आसमानों में !!??

Friday, September 24, 2010

प्रेम आस...

जब पास ही प्रकाश हो
और चक्षुओ में आस हो
तो मन पटल को खोल दे
की सत्य का आभास हो

जब प्रेम का प्रयास हो
ह्रदय में मीठी प्यास हो
तो आलिंगन से सिक्त कर
की प्रेम का विश्वास हो

जब जीवन के पल में हर घडी
उस माधुरी का वास हो
तो छेड़ ऐसी मुरली तान
की कृष्ण का भी रास हो

जब मन में ये विश्वास हो
और जीतने की चाह हो
तो विरक्त हो के बंधन से
कर कर्म न निराश हो

Thursday, September 23, 2010

यादों का मकाँ ...

इस मकान में बंजरपन है
ख़ामोशी है , साया है
जबसे तेरी याद बसाई
तबसे कोई न आया है

जहाँ सारा तो रोशन लेकिन
मेरा घर अँधियारा है
बीते पल ही जुगनू बनकर
करते अब उजियारा हैं

इस बंजर मन , बीहड़पन में
आँखें भी सुनसान हुई
अब इस सड़क से अपने घर तक
रोज़ अकेले जाना है

चाँद भी टूटा ,दरख़्त भी सूखे
ये संसार हमारा है
ये डालें रोशन नहीं है अब
यहाँ बसेरा अंधेरो ने डाला है

जब याद तुम्हारी आती है
तो बारिश आँखें करती हैं
इस सैलाब में डूबते उतरते हैं
मुकद्दर ही बेचारा है

जब इन्साफ के दिन हम रोकर
खुदा के घर को जाएंगे
तब उस से पूछेंगे
किस गुनाह की सज़ा है मालिक
खुद दीवानगी का मारा है

मरके सबको सुकूँ है मिलता
हमको जीते जी क्यों मारा है
बेचैनी सी है मरके भी
आखिर क्या क़ुसूर हमारा है

Wednesday, September 22, 2010

दीप्तिमान ....

इन सूक्ष्म जुगनुओ से,
इन अलोकिक दीपों से,
मानवता की ये मशाल
दीप्तिमान कर दो

भ्रमर के गुंजन से
प्रकृति के क्रंदन से
आकाश के भंजन से
इस समस्त ब्रह्माण्ड को
गुंजायमान कर दो

इन देवो के संगम से
ऋषियों के संयम से
इस प्राकृत विहंगम से
अंश समावेश कर
मूर्त रूप का एक
इंसान कर दो

आज घमासान कर दो
दीप्तिमान कर दो
प्रेम की ,तपस्या की
एक रूपता की
समस्त पृथ्वी ,ब्रह्माण्ड की
एकता अक्षुन्नता को
अखंड प्राण कर दो
घमासान कर दो
गुंजायमान कर दो