Tuesday, July 3, 2012

मैं मसखरा हुआ...


दिलों के ग़म मिटाने को,आँखों से नमी हटाने को
जहाँ तेरा आंसू गिरा, उस राह को चमन बनाने को
तेरी यादों के सिरहाने ही , अपना जनाज़ा उठाने को,
उधार के ग़म लेकर, अपनी राह चले जाने को,
खुशमिजाज़ रहता हुआ,
मैं  मसखरा  हुआ....

यारों की महफ़िल मैं,सबके राज़ छुपाने को,
चाक जिगर सीने को,उधार की ज़िन्दगी जीने को,
उनकी राहत में अपनी राह भूल जाने को ,
उनके ग़म मैं अपनी ख़ुशी जलाने को,
स्याह सर्द रातों में,गर्म लावे की तरह बहता हुआ...
मैं  मसखरा  हुआ....

किसी ने न सिला दिया मेरे प्यार का,
दिल को न सुकून मिला,दाग़ दार का,
सर्द रातों को न मिली कोई खुशनुमा सुबह,
रात मैं गुज़र गया ,लम्बे इंतज़ार सा,
दिखा नहीं सीने में मेरे सुराख दर्द का,
मंज़र नज़र आता रहा, उस पार का,
खुदा भी नागवार हुआ,खुदाई भी गिरी,
मज़ाक सी ज़िन्दगी बख्शी, 
वो ज़ालिम ,खुदा हुआ!!?,
अपने ग़म को पीता रहा,
सबको हँसाकर  जीता रहा
मैं मसखरा हुआ?!!....

Thursday, April 26, 2012

अंतिम खोज....

मृगतृष्णा सा आभास भी नहीं,
सफलता या संघर्ष ,क्या है जीवन?
भूत, भविष्य या वर्तमान,
कपोल कल्पनाएँ या यादों में जियें,
वादों में या इरादों में...
कहाँ जाएँ ,व्याकुलता है पर प्यास नहीं...
तर्क-कुतर्क सब कुछ पल का सब्र बंधाते हैं,
फिर से वही आकुलता, ह्रदय डूबने का एहसास,
वही बेचैनी,वही बेज़ार सा दिल हो जाता है,
फिर किसी बीते,असम्भव इरादे से प्यार हो जाता है,
तलाश किसकी,ज़िन्दगी या एहसास की,
प्रेम की या वासना की,पूर्णता की या अपूर्णता की,
चक्रव्यूह है विचारों का,
क्या येही वो ध्येय है, क्या ये वो रास्ता है,
सफ़र ही जीवन है, या मंजिल पा जाना ,है अंतिम खोज....

Saturday, January 28, 2012

बेरुख़ी मुबारक..



जिसको था इंतज़ार तेरा उसको ही खबर नहीं,
बेपरवाह तू है मगर इतनी बेखबर नहीं,
महरूम हो मेरी चाहत से या हो इतनी मसरूफ,
की मेरा पता नहीं न सही,खुद की भी खबर नहीं!!

तेरी चाहत मैं अब वो कशिश नहीं,
डूब जाने जैसी अब वो नज़र नहीं,
बेफिक्र हो जाओ मेरी पुकार से ,
तेरी गलियों से अब मेरी रहगुज़र नहीं..

अब फ़ना है तेरे ख़याल 
मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से,
आती है बड़ी हसी मुझे अपने आप पे,
चाहत की फिकर नहीं, आँहो का असर नहीं,
जाओ, खुश रहो वहीँ जहाँ तुम्हारी कदर नहीं...

Thursday, January 19, 2012

सांसे...

कभी कभी ज़िन्दगी में कमी महसूस होती है,
पत्थर सी आँखों में भी नमी महसूस होती है,
मुहब्बत की मजलिस में बड़ी भीड़ है लेकिन,
किसी एक बुत के लिए साँसे थमी महसूस होती है...

संगमरमरी साया और बर्फ की आँखें,
तेरे आगोश में सांसें भी जमी महसूस होती हैं...
मौत की तरह, थाम ले हाथ मेरा,
ज़िन्दगी में तो सिर्फ नाकामी महसूस होती है...


तेरी कमी महसूस हुई...

खुशमिजाज़ तो तबियत रहती है मेरी,
मुस्कुराने की बात आई तो तेरी कमी महसूस हुई...

शामें रोशन कर दी शफ्फाक यादों ने,
आँखों मैं ढलती रात आई तो तेरी कमी महसूस हुई...

धुआं धुआं सा रहता है सुबहो का मंज़र,
धुप से खिले चेहरे की याद आई तो तेरी कमी महसूस हुई...

अज़ाने ,नमाज़ें ,मुरादें अभी  कितनी बाकी हैं,
हर सजदे मैं तेरी याद आई तो तेरी कमी महसूस हुई....

यूँ तो बातें करने को तमाम दुनिया है,
हर बात से पहले तेरी बात आई तो तेरी कमी महसूस हुई....










Tuesday, October 18, 2011

ज़िन्दगी का सफ़र...क्या खोया क्या पाया....

कितनी  रौशनी  है  शहर  के  आसमान  में
ना चाँद  है  ना  सितारों  का  निशाँ
कितनी  भीड़   है  इस  शहर  की  ज़मी  पे
ना  उम्मीद  है  ना  मंजिल  ना  इंसान

हम  मशीनों  में  बदल  रहे  हैं
भेड़  चाल  में  चल  रहे  हैं
सुकून  की  बातें  तो  बहुत  होती   है
लेकिन  सुकून  पाने  को  मचल  रहे  हैं

खोजते  हैं  अपने  बचपन  को
शरारतें  और  लड़कपन   को
पैसा  कमाने  के  लिए  सब  गवां  दिया
नशे  में  डुबो  दिया  अपने  क्रंदन  को

कैसे  बचपन  से  बड़े  होने  के  सपने  पाले
बड़े  होकर  आसमान  छु  लेने  के  इरादे
कैसे  धीरे  धीरे  सब  कुछ  भुला  बैठे
वो  दोस्ती ,वो  रिश्ते , वो  खुद  से  किये  वादे

अब  फिर  से  बचपन  जीने  को  मनन  करता  है
माँ  की  गोद में  सोने  को  मन   मरता  है
दिनभर  खेलके  भी  थकान  नहीं  होती  थी
साड़ी  परिकल्पनाये कहानियों  मैं  होती  थी  

अब सब खो गया सा लगता है
रात का बीता सपना सा लगता है
रात तो चली जाती है लेकिन
नयी सुबह का आना कल्पना सा लगता है



फना हो गए जिसकी आरज़ू में
ना वो सफ़र ख़त्म हुआ ना ,ना वो अंजाम मिला 

Saturday, October 1, 2011

जो तुम देख सकते....

जो तुम देख सकते इस चेहरे के पीछे तो,
सच्चाई का पर्दा फ़ाश हो जाता...
जो तुम देख सकते इन आँखों के भीतर,
तो मुहब्बत का रास्ता साफ़ हो जाता...
जो तुम जान पाते की शराफत लिबास की मोहताज नहीं,
तो इन स्याह कपड़ो का रंग पाक़ हो जाता....
जो तुम सुर मिलाते मेरी हँसी में,
तो गुनाहों की रातों का मंज़र शफ्फाक हो जाता...
जो तुम जलते इस आतिश-ए-वफ़ा में,
तो ये परवाना ख़ुशी से खाक हो जाता.....



नादान मुहब्बत की आरजू थी लेकिन,
मुहब्बत में नादानी की सज़ा का अंदाजा नहीं था....