Monday, January 3, 2011

बेख़बर ...

दर्द है दर्द का बयाँ नहीं
राह है मंजिल-ओ-मकाँ नहीं
परस्तिश करते हैं तेरी ए नादाँ
मगर तेरा एक ज़र्रा भी मेहरबां नहीं

Thursday, December 16, 2010

क्या होगा !!!??

दायरा बढ़ने लगा
तिनके के ही गिरने से
ये तो सिर्फ एक झोंका था
क्या होगा तूफानों में !!??

एक बूँद ही दामन भिगा गई
सीलन सी आ गई रिश्तों में
अभी तो बादल गरजे हैं
क्या होगा बरसातों में !!??

पत्थर की तपिश से झुलस गए
छोड़ राह , चल दिए सायों में
अभी तो सफ़र का आगाज़ हुआ
क्या होगा गर्म चट्टानों में !!??

एक कांटे ने दामन पकड़ लिया
चुभन ने बेचैन कर दिया
अभी तो फूल भी साथ हैं
क्या होगा बीयाबानों में !!??

जो तुम दोगी साथ मेरा
रिश्तो की डोर न तोड़ेंगे
तुम ज़मीं पे साथ नहीं देती
क्या होगा उन आसमानों में !!??

Friday, September 24, 2010

प्रेम आस...

जब पास ही प्रकाश हो
और चक्षुओ में आस हो
तो मन पटल को खोल दे
की सत्य का आभास हो

जब प्रेम का प्रयास हो
ह्रदय में मीठी प्यास हो
तो आलिंगन से सिक्त कर
की प्रेम का विश्वास हो

जब जीवन के पल में हर घडी
उस माधुरी का वास हो
तो छेड़ ऐसी मुरली तान
की कृष्ण का भी रास हो

जब मन में ये विश्वास हो
और जीतने की चाह हो
तो विरक्त हो के बंधन से
कर कर्म न निराश हो

Thursday, September 23, 2010

यादों का मकाँ ...

इस मकान में बंजरपन है
ख़ामोशी है , साया है
जबसे तेरी याद बसाई
तबसे कोई न आया है

जहाँ सारा तो रोशन लेकिन
मेरा घर अँधियारा है
बीते पल ही जुगनू बनकर
करते अब उजियारा हैं

इस बंजर मन , बीहड़पन में
आँखें भी सुनसान हुई
अब इस सड़क से अपने घर तक
रोज़ अकेले जाना है

चाँद भी टूटा ,दरख़्त भी सूखे
ये संसार हमारा है
ये डालें रोशन नहीं है अब
यहाँ बसेरा अंधेरो ने डाला है

जब याद तुम्हारी आती है
तो बारिश आँखें करती हैं
इस सैलाब में डूबते उतरते हैं
मुकद्दर ही बेचारा है

जब इन्साफ के दिन हम रोकर
खुदा के घर को जाएंगे
तब उस से पूछेंगे
किस गुनाह की सज़ा है मालिक
खुद दीवानगी का मारा है

मरके सबको सुकूँ है मिलता
हमको जीते जी क्यों मारा है
बेचैनी सी है मरके भी
आखिर क्या क़ुसूर हमारा है

Wednesday, September 22, 2010

दीप्तिमान ....

इन सूक्ष्म जुगनुओ से,
इन अलोकिक दीपों से,
मानवता की ये मशाल
दीप्तिमान कर दो

भ्रमर के गुंजन से
प्रकृति के क्रंदन से
आकाश के भंजन से
इस समस्त ब्रह्माण्ड को
गुंजायमान कर दो

इन देवो के संगम से
ऋषियों के संयम से
इस प्राकृत विहंगम से
अंश समावेश कर
मूर्त रूप का एक
इंसान कर दो

आज घमासान कर दो
दीप्तिमान कर दो
प्रेम की ,तपस्या की
एक रूपता की
समस्त पृथ्वी ,ब्रह्माण्ड की
एकता अक्षुन्नता को
अखंड प्राण कर दो
घमासान कर दो
गुंजायमान कर दो

Tuesday, August 24, 2010

ये शाम ये तन्हाई का मंज़र ...

ये नीला आसमां
काला सा होता जा रहा है
क्या रात की तन्हाई में
इसे कोई याद आ रहा है

ये हरे भरे दरख़्त
रात की स्याही में ढल रहे हैं
वो ख़ुशनुमा मंज़र
अब सायों के हवाले हो रहे हैं

पंछियों का शोर -ओ -गुल
अहिस्ता अहिस्ता कम हो रहा है
रात के आग़ोश में
ये कैसा सितम हो रहा है

दूर , फ़लक
ज़मीं से मिलता जा रहा है
डूबते सूरज का अंगारा
पानी पे खिलता जा रहा है

इस मंज़र में
इस शाम की तन्हाई में
याद आते हैं बीते लम्हे
यादों की परछाई में

क्या मुझी से मेरा साया
दूर होता जा रहा है
क्या मेरी ज़िन्दगी का सबब
इस अंधेरे में खोता जा रहा है

शायद मुझे कोई याद आ रहा है
शायद मुझे कोई पास बुला रहा है

Tuesday, July 20, 2010

मेरी आरज़ू...

कुछ अनमनी सी कुछ बेचैन हो
क्यों अपनी नींदे उड़ाए बैठी हो
मुहब्बत में गिरकर फिर से संभल रहा हूँ में
क्या इस बात पर दिल दुखाये बैठी हो

जब प्रेम समंदर के उस झंझावात में
फंसा था तेरे साथ में
कैसे दामन थाम लिया किसी और का
छोड़ के मुझको उस हालात में
तब मेरी बेबसी पे तरस नहीं आया
और अब मुह फुलाए बैठी हो

किसी और से मुहब्बत न हो जाये
कम तेरी अहमियत न हो जाये
कहीं यही सोचकर तो नहीं
नज़रें चुराए बैठी हो

मैंने तो चाहा साथ रहूँ
थाम के तेरा हाथ रहूँ
मिसालें लोग दे हमारे प्यार की
रहते हैं जैसे दिन-रात रहूँ

दूर जाने का कदम तूने उठाया था
शायद मुझसे बेहतर किसी और को पाया था
तुझे खुश देख के कुछ न बोल पाया था
आज भी एक ही ख्वाहिश है की
मेरी ख़ुशी में मेरे साथ रहो
कैसे भी हो हालात रहो

सिर्फ एक आरज़ू है
की मुहब्बत नहीं तो कम से कम साथ ही दे दो
हाथ नहीं दे सकती हाथों में तो एक मीठी बात ही दे दो
तेरी हर ख़ुशी में शामिल हुआ था मैं
मेरी ख़ुशी के लिए ,झूठ मूठ ही सही
खुश होने की सौगात ही दे दो